tumhaari pehchaan tum khud ho
khud ko dhoondoge to apni pehchaan bhi mil jaayegi.
April 20, 2011 at 10.26 P.M.
CLOSE TO ME
My friends,
It feels good to have my own blog.....there are things which are close to my heart and things which have affected me one way or the other.....my thoughts,my desires,my aspirations,my fears my gods and my demons---you will find all of them here....I invite you to go through them and get a glimpse of my innermost feelings....................
It feels good to have my own blog.....there are things which are close to my heart and things which have affected me one way or the other.....my thoughts,my desires,my aspirations,my fears my gods and my demons---you will find all of them here....I invite you to go through them and get a glimpse of my innermost feelings....................
Wednesday, April 20, 2011
Tuesday, April 19, 2011
तुम..
तुम हो भी साथ
और नहीं भी
सामने भी हो
और आँखों से ओझल भी
तुम्हारे शब्दों को समेट
अपनी झोली में
चली आई
कि जब तुम नहीं
तो तुम्हारे शब्दों के साथ
वक़्त गुजरेगा
अच्छे, बुरे,
प्यार भरे,
कुछ अपने में कई कटाक्ष लिए
कुछ अपने में मेरा पूरा संसार समेटे
तुम्हारे साथ की दुहाई देते
पर यह दिल है कि कहता है
कि तुम नहीं हो
कहीं नहीं हो.....
April 19, 2011 at 5.23 P.M.
और नहीं भी
सामने भी हो
और आँखों से ओझल भी
तुम्हारे शब्दों को समेट
अपनी झोली में
चली आई
कि जब तुम नहीं
तो तुम्हारे शब्दों के साथ
वक़्त गुजरेगा
अच्छे, बुरे,
प्यार भरे,
कुछ अपने में कई कटाक्ष लिए
कुछ अपने में मेरा पूरा संसार समेटे
तुम्हारे साथ की दुहाई देते
पर यह दिल है कि कहता है
कि तुम नहीं हो
कहीं नहीं हो.....
April 19, 2011 at 5.23 P.M.
अंतर्द्वंदव्
अंतर्द्वंदव् से जूझते
जीवन की डगर पर चलते
कभी हब्शी
कभी मानस
कभी पत्थर
कभी पारस
कभी इन्सां
कभी भगवान्
अपनी पहचान खोजते
सब चलते जा रहे हैं
बस चलते..
April 19, 2011 at 4.26 P.M.
जीवन की डगर पर चलते
कभी हब्शी
कभी मानस
कभी पत्थर
कभी पारस
कभी इन्सां
कभी भगवान्
अपनी पहचान खोजते
सब चलते जा रहे हैं
बस चलते..
April 19, 2011 at 4.26 P.M.
Thursday, April 14, 2011
Concrete Jungle
Concrete jungle,
smothering life.
Huge, steel chimneys,
spewing out smoke,
suffocating.
Nights foggy,
days smogy.
Buildings mere structures,
strangling everyone in their wake.
Noisy streets,
stifling voices.
The fragile frame of psyche,
being killed steadily.
Asphyxiated life,
no respite,
no recourse,
but to die sluggishly.
April 14, 2011 at 10:21 P.M.
smothering life.
Huge, steel chimneys,
spewing out smoke,
suffocating.
Nights foggy,
days smogy.
Buildings mere structures,
strangling everyone in their wake.
Noisy streets,
stifling voices.
The fragile frame of psyche,
being killed steadily.
Asphyxiated life,
no respite,
no recourse,
but to die sluggishly.
April 14, 2011 at 10:21 P.M.
Sunday, April 10, 2011
Who Am I?
Who am I?
Am I who I think I am?
Or, am i who others think me to be?
Or, am I actuaaly who I am?
I am three persons rolled into one.
The one I think I am
The one others think I am.
And, the one I actually am.
June 27, 2001 at 12.42 A.M. London time
Am I who I think I am?
Or, am i who others think me to be?
Or, am I actuaaly who I am?
I am three persons rolled into one.
The one I think I am
The one others think I am.
And, the one I actually am.
June 27, 2001 at 12.42 A.M. London time
उदारता
उसकी रज़ा मान,
मैं चलती रही!
न पैरों के छाले देखे,
न उनसे रिसता खून ही दिखा!
छलनी हाथों से राह के,
काँटे हटाती रही!
जानती थी वो मेरे साथ है!
छालों से रिसता खून मेरा न था!
हाथों में काँटों की चुभन भी मेरी न थी!
जानती थी की वो दयावान है!
मन में उसकी उदारता का विश्वास लिए,
मैं चलती रही!!!!
April 10, 2011 at 5.36 P.M.
मैं चलती रही!
न पैरों के छाले देखे,
न उनसे रिसता खून ही दिखा!
छलनी हाथों से राह के,
काँटे हटाती रही!
जानती थी वो मेरे साथ है!
छालों से रिसता खून मेरा न था!
हाथों में काँटों की चुभन भी मेरी न थी!
जानती थी की वो दयावान है!
मन में उसकी उदारता का विश्वास लिए,
मैं चलती रही!!!!
April 10, 2011 at 5.36 P.M.
Thursday, April 7, 2011
सपने बस सपने....
मंद हवा की तरह
गालों को सहलाती
तितली की तरह
यहाँ से वहाँ उड़ती फिरती
एक अल्हड़ मौज
जो किनारे को छू लौट आती
मन में जवानी की लहक
आखों में यौवन की चमक
साँसों में जीवन की महक
इसी लहक, महक, चहक में
बचपन कहीं पीछे छूट गया
उड़ती आज भी हूँ
पर पंखो का रंग फीका पड़ गया है
चहकती हूँ
पर दर्द छुपा नहीं पाती
जीवन की सड़न है
अब महक में
टूटे हुए सपने
रिसते हैं हर पल
April 07, 2011 at 4.14 P.M.
गालों को सहलाती
तितली की तरह
यहाँ से वहाँ उड़ती फिरती
एक अल्हड़ मौज
जो किनारे को छू लौट आती
मन में जवानी की लहक
आखों में यौवन की चमक
साँसों में जीवन की महक
इसी लहक, महक, चहक में
बचपन कहीं पीछे छूट गया
उड़ती आज भी हूँ
पर पंखो का रंग फीका पड़ गया है
चहकती हूँ
पर दर्द छुपा नहीं पाती
जीवन की सड़न है
अब महक में
टूटे हुए सपने
रिसते हैं हर पल
April 07, 2011 at 4.14 P.M.
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