CLOSE TO ME

My friends,
It feels good to have my own blog.....there are things which are close to my heart and things which have affected me one way or the other.....my thoughts,my desires,my aspirations,my fears my gods and my demons---you will find all of them here....I invite you to go through them and get a glimpse of my innermost feelings....................

Tuesday, June 4, 2013

तुम्हारी अनकही बस अनकही ही रह गई-------

तुम्हारी अनकही बस अनकही ही रह गई-------

गहन पीड़ादायक अनुभवों से गुज़र, 
वेदनाओं से झूझते हुए, 
यातनाओं के पुल को पार,
जहाँ बसाया था हमने!

प्रेम के शीतल जल के छींटों-सा, ,
ताज़गी भरा एहसास,
छू-छूकर गुज़रता था!
मधुरतम गानों के स्वर,
गूँजते थे हर ओर!

तुम्हारे अनमोल बोल,
उतर गए थे जो अंतर्मन में!
काँपती उँगलियों से,
छुआ था जब तुमने,
हज़ारों सितारों की तरंगें सा,
बज उठा था पोर-पोर!

कही-अनकही बातें,
आज फिर आतुर हुईं हैं!
कभी तृप्त हुए मन की वेदना,
आज फिर उभर आई है!
तुम्हारे साथ गुज़ारे,
क्षणों की अनुभूति ने,
आज फिर झंझोड़ दिया है!

(माप-दंड क्या करना, क्या सही क्या गलत---- होने न होने का क्या संशय--जब यकीं है कि तुम हो----------)
((हर वेदना को अपनी “सेंसिबिलिटी” से जितनी शिद्दत से महसूस किया कह दिया---------तुम्हारी अनकही बस अनकही ही रह गई-------))
गहन पीड़ादायक अनुभवों से गुज़र,
वेदनाओं से झूझते हुए,
यातनाओं के पुल को पार,
जहाँ बसाया था हमने!

प्रेम के शीतल जल के छींटों-सा, ,
ताज़गी भरा एहसास,
छू-छूकर गुज़रता था!
मधुरतम गानों के स्वर,
गूँजते थे हर ओर!

तुम्हारे अनमोल बोल,
उतर गए थे जो अंतर्मन में!
काँपती उँगलियों से,
छुआ था जब तुमने,
हज़ारों सितारों की तरंगें सा,
बज उठा था पोर-पोर!

कही-अनकही बातें,
आज फिर आतुर हुईं हैं!
कभी तृप्त हुए मन की वेदना,
आज फिर उभर आई है!
तुम्हारे साथ गुज़ारे,
क्षणों की अनुभूति ने,
आज फिर झंझोड़ दिया है!

(माप-दंड क्या करना, क्या सही क्या गलत---- होने न होने का क्या संशय--जब यकीं है कि तुम हो----------)
((हर वेदना को अपनी “सेंसिबिलिटी” से जितनी शिद्दत से महसूस किया कह दिया----तुम्हारी अनकही बस अनकही ही रह गई------))
June 4, 2013 at 8.55 P.M.


लेबलों से किया प्रेम..............



शब्द कभी नहीं मिटते,
अंकित रहते हैं उनके प्रतिबिंब,
हमारे मुख पर!
मनोवेग, भावना के साथ,
बहते हैं हमारी रगों में,
खून की तरह!

अतीत तो जी चुके थे हम,
साथ-साथ!
निशब्द भी हुए थे कई बार!
निशब्दता ने धूंधलाया नहीं था कभी,
अतीत के आईने को! 

अद्भुत था हमारा अतीत!
और तुमने उसे गलती का,
भयावह नाम दे दिया!
प्रेम कभी गलत नहीं होता,
गलत तो निर्णय होते हैं!

(गलत-सही के लेबल कब से लगा दिये तुमने-----प्रेम तो शर्तों से नहीं किया था हमने............)
June 4, 2013 at 11.19 A.M.

Monday, June 3, 2013

महसूस करो कि मेरे साथ हो तुम.......



छत पर उस रात,
पहली बार देखा था,
चाँद को धरती के इतने करीब!
मानों छू लूँगा हाथ बढ़ा!

तुम्हारा अक्स था,
उस रात चाँद के  
चेहरे पर!
गर छू लेता चाँद को,
तुम्हें छू लेने की अनुभूति हो जाती!

लगा कि चाँद देख रहा है,
मेरे कानों की ओर!
आभास हुआ कि किसी भी क्षण,   
दो होंठ उभर आयेंगे,   
उसके चेहरे पर,
जो फुसफुसा के कहेंगे,  
"बहुत प्यार करता हूँ तुम्हें!"   

मन करता है,
वो जो भी कह रहा है,
उसे कहने दूँ!
खुद को भूल जाऊँ,
क्योंकि तुम सुन रहे हो!

तुम और मैं,
एक ही हथकड़ी में बंधे,
न तुम बरी होगे,
न मैं!

तुम्हारी हँसी में,
चाँद की ठंडी चमक है,
शीतल कर देती है,
जो भीतर तक!

(सब महसूस कर, लिख देना चाहता हूँ  और चाहता हूँ कि तुम भी लिख दो सब-----)
((जब तुम लिख दो सब तब भी यही महसूस करो कि तुम नहीं कोई और लिख रहा है और जब लगे कि कोई और लिख रहा है तो महसूस करो कि वह कोई और नहीं तुम ही हो.......))
June 3, 2013 at 12. 19 A.M.


Friday, May 31, 2013

तुम्हारे भावों में उलझा-----तुम्हारे प्यार से सुलझा.......



तुम्हारा-मेरा प्रेम,
कढ़ाई में लगी उस हल्दी की भाँति
जो घिस-घिसकर साफ करने से भी नहीं छुटता!

थपक थपक दिल थपक थपक!
नगाड़े की तरह बजते शब्द!

प्रेम की चाह,
जो बाँधे है हम दोनों को!
मोहब्बत ठहर गई थी
हमारे अन्दर!
हमारी बात के अन्दर
हमारी जात के अन्दर!

झुंझलाना, गुस्सा करना,
सब तो तुम्हारे ही साथ!
सब प्रेम के ही हिस्से थे!
अलग नहीं थे हम!

तुम्हारी बाहों का तकिया,
मेरे सपने!
तुम्हारा रूठना,
मेरा मनाना!
तुम्हें बुरा लगना,
सब तो मेरा ही था!

(कभी आबे-रवाँ बनकर............कभी कतरे की सूरत में--बह रहा था दोनों के भीतर.......)
((तुम्हारे भावों में उलझा-----तुम्हारे प्यार से सुलझा........तुम्हारे ही जैसा मैं---मेरे जैसी तुम......))
May 31, 2013 at 1.48 A.M.




Thursday, May 30, 2013

प्रेम के इंद्रधनुषी रंगों का भरोसा----------------




वो जो सोहनी कच्चे घड़े से
चिनाब पार कर गई!
वो जो फरहाद,
दूध का दरिया निकाल दिया,
जिसने पत्थरों से!

वो जो जात-पात को पीछे छोड़,
उम्र की दीवारों को लाँघ,
वो जो घरों की देहलीज फलाँग,
सबसे नाता तोड़,
चले गये! 

वो जो छुपते-छुपाते,
एक-दूसरे के संग भागते रहे!
वो जो बसें, रेलगाडीयाँ,
होटल, शहर,
बदलते रहे!

वो जो दुनिया के
रस्मों-रिवाज को
अँगूठा दिखा,
अपने में जीते रहे!

(प्रेम के इंद्रधनुषी रंगों के भरोसे---- उड़ते हैं खुले आसमां में.............)
May 30, 2013 at 5. 12 P.M.

  


Tuesday, May 28, 2013

कैसे परिभाषित करूँ..... प्रेम को.......



ढाई अक्षर का छोटा-सा शब्द,
अपने आप में कितने सारे अर्थ समेटे।
विराट स्वरूप,
अनंत छोर तक फैला असीमित विस्तार,
निर्विकार प्रेम,
कैसे परिभाषित करूँ तुम्हारे लिये!

प्रेम की सर्वोत्तम अभिव्यक्ती,
केवल मौन है!
प्रेम मानव मन का भाव है,
जो कहने-सुनने के लिए नहीं
बल्कि समझने और महसूस करने के लिए होता है।

याद नहीं क्या तुम्हें,
प्रेम की मादकता भरी खुशबू को
कई बार महसूस किया है हमने!

समर्पण, अपनापन,
देह से बढ़कर आत्मा की गहराई तक,
सब तुम्हें अर्पण कर दिया!

(काली नागिन सी ज़ुल्फें डसना छोड़ देंगीं---प्रेम क्‍म नहीं होगा----- तुम अचानक एक दिन बाजार में मिलोगी, और तुमको देखते ही मैं फिर से जवान हो उठूँगा......... देह को मिट्टी होना है, हो ही जायेगी....... तुम्हारे लिये प्रेम तो रहेगा तब भी--------)
May 28, 2013 at 4.12 P.m.

वक़्त लग जाता है अपनों को समझाने में-----



तुम्हारे प्रेम में,
जलते हुए पत्थरों से,
ओस की बूँदें टपकी हैं!

जिस्म छिल गया,
रूह पर मरहम
बाकी है!

हादसों भरी ज़िंदगी में,
तुम्हारे प्रेम का,
भरम अभी बाकी है!

काँटों भरे दिन में,
मुलायम तेरे प्यार की,
महक शब में अभी बाकी है!

पाँव के छालों से,
हाथों के ज़ख्मों तक का सफर,
अभी बाकी है!

दिल चीर कर क्या दिखाऊँ तुम्हें,
रोम-रोम पर,
तेरी परछाईं,
बाकी है!

शब्दों की माला पिरोना क्या,
हर बोल में,
तेरा असर बाकी है!!!!

(वक़्त लग जाता है अपनों को समझाने में----- ये एहसास दिलाना बाकी है......... )
May 28, 2013 at 1. 12 P.M.