CLOSE TO ME

My friends,
It feels good to have my own blog.....there are things which are close to my heart and things which have affected me one way or the other.....my thoughts,my desires,my aspirations,my fears my gods and my demons---you will find all of them here....I invite you to go through them and get a glimpse of my innermost feelings....................

Monday, September 30, 2013

कैसा यह शहर है........


कैसा यह शहर है,
इंसान हैं, पर दिल नहीं
दोस्त हैं, पर दोस्ती नहीं।
हर कोने में मक़ान हैं,
घर तो दिखते ही नहीं।

खटखटाया था इक मक़ान का दरवाज़ा,
ईमां की दीवारें ढह रही थीं
ज़िंदगी रेत की मानिंद,
हाथों से फिसलती दिखी।

झूठे रिश्तों पर टिका,
हर बाशिन्दे का महल दिखा।
आँखों में रोशनी तो दिखी,
पर प्यार की सच्चाई नहीं दिखी।

कैसा यह शहर है,
इंसान हैं, पर दिल नहीं

आसमां तो दे देते हैं,
पाओं तले से ज़मीं खींच लेते हैं।
सीने में दिल तो है शायद,
प्रेम का दिया जलता नहीं।

तलाशता है हर आदमी,
अरमानों का खूं करने को।
मोहब्बत जो आँखों तक पहुँच जाए,
ऐसे जज़्बात दिखते नहीं।

(लौट जाती है दीवारों से टकरा कर आवाज़ें.....दिलों की धड़कन कोई पहचानता नहीं............)
September 30, 2013 at 12.42 A.M.





Wednesday, September 18, 2013

वक़्त देखो कितनी तेज़ी से चलता जा रहा है.....................


वक़्त देखो कितनी तेज़ी से चलता जा रहा है,
अपने वेग से उड़ता जा रहा है,
हम हैं कि वहीं के वहीं बैठें हैं,
जाने क्या सोचते रहते हैं,
जीते तो हैं ही नहीं किसी भी पल को,
हर पल इक नयी मौत मरते रहते हैं,
बस वक़्त काटते रहते हैं,
और यह बेदर्द व़क़्त हमें ही काटता रहता है,
कहीं पहुँच नहीं पाते,
न ही कहीं पहुँचने की तमन्ना रखते हैं,
बस गुज़ारते रहते हैं यूँ ही ज़िंदगी,
बिना कुछ पाये,
सब गवायें बैठे हैं,
न किसी को अपना बना सकते हैं,
ना किसी के हो सकते हैं, 
फिर वक़्त हथेली से,
रेत की मानिंद बिखर जाता है,
और हम उसका गुबार देखते रहते हैं.......
(.... इक दिन सब मिट्टी में मिल जाना है, बस हम ही नहीं समझ पाते हैं....)
September 18, 2013 at 12.04 A.M.

Monday, September 2, 2013

क्या बस इतना ही काफी नहीं ...

याद है क्या तुम्हें,
कहा था इक दिन तुमने:
मन की भाषा को,
दूसरा समझ ले,
बिना कुछ कहे

इस अनकही को सुन,
मन, 
आनंदित हो,
पुलकित हो।

और भाव-विभोर हो,
मिल जायें दोनों इक दूजे से,
जिस तरह क्षितिज पर 
मिलते हैं,
धरती-आकाश,
जैसे  भावों और सोच के धरातल पर  
एक दूसरे से मिल लें
और लीन हो जायें,
इक दूजे में।

क्या बस इतना ही काफी नहीं ...

हवा बन बहते रहे तुम... खोजती तुम्हें, रुकी जब निढाल हो गयी......पा न सकी पर तुम्हें.......
(September 1, 2013 at 11.24 P.M.)