CLOSE TO ME

My friends,
It feels good to have my own blog.....there are things which are close to my heart and things which have affected me one way or the other.....my thoughts,my desires,my aspirations,my fears my gods and my demons---you will find all of them here....I invite you to go through them and get a glimpse of my innermost feelings....................

Saturday, September 17, 2011

वक़्त.....

गर उनका आना हो जाता
वो भी वक़्त से कुछ लम्हे चुरा लेते!
पर बेरहम वक़्त को कहाँ मंज़ूर!
वक्‍त तो वक्‍त है!
किसी की भावनायों की,
वक़्त को क्या पड़ी!
पर किस-किस की भावनायों का ध्यान रखे वो?
यह तो अपना काम करता है बस!
जो समझते हैं वक़्त को,
उनकी भावनाएं तो समझ सकता है कमबख्त!
वक्‍त, पर, किसी के साथ नहीं रहता,
सब वक्‍त के साथ रहते हैं!
पर हाथ नहीं थामता किसी का!
बस संकेत भर करता है
कि चले आओ----
सब घबराहटों को पीछे छोड़कर,
मैं साथ हूं तुम्‍हारे------
September 17, 2011 at 4.33 P.M.

Thursday, September 15, 2011

मृगतृष्णा....

हाथ जब तुमने थामा,
कहा कि सात जन्म न छोडूंगा!
मैं तुम्हारा शिव, तुम्हारा राम,
तुम्हारा कृष्ण बन दिखलाऊँगा!
न तुम शिव बन मेरा मान रख पाए,
न मेरे राम बन पाए,
न ही कृष्ण सा प्यार कर पाए मुझसे!
मैंने कब तुमसे शिव माँगा,
कब चाहा कि तुम राम या कृष्ण बनो मेरे!
एक प्रेमी चाहा था,
जो मेरा हाथ थाम
चलता रहे मेरे साथ!
मगर....तुम्हारा साथ,
.....तुम्हारा प्यार
सब मृगतृष्णा निकला!
September 15, 2011 at 10.33 P.M.

Wednesday, September 7, 2011

बारूद....

घर से निकले थे काम पर,
कह कर गए, मिलेंगे शाम होते!
राह में नज़र के सामने,
था वीभत्स नज़ारा!
दरिंदों ने फिर किया था वार,
चारों ओर रुद्रण, चीत्कार, हाहाकार!
कहीं खून के लोथड़े,
कहीं कटा हाथ!
कहीं माँ की गोद में बच्चे का धड,
कहीं बच्चे के सामने पिता की लाश!
ज़ार-ज़ार रो रहीं थी आँखें,
कहीं मौत का सन्नाटा!
ज़िन्दगी बिखरी पड़ी थी चारों ओर,
मौत का था नंगा नाच!
जिस्म घायल. रूह छलनी
मन विचलित,
आँखें नम!
क्या कहें कि हो मन की व्यथा कम!
धीरज रख ऐ मन,
होगा इस काली रात का सवेरा भी!!!!!!
September 07, 2011 at 10.05 P.M.

Friday, September 2, 2011

दर्द की दास्ताँ

रोज़-रोज़ मरती थी वो! पति हर रात दारू के नशे में बुरा-भला कहता! सुनती! कभी रोती! कभी बस आह भर रह जाती! जाने कौन घड़ी में माता-पिता ने ऐसे व्यक्ति से सम्बन्ध जोड़ा था! उस समय तो सब बहुत अच्छा ही दिख रहा था! सब ठीक था भी! शराब तो वो पहले भी पीता था! परन्तु इतनी अती की नहीं! अब ऐसा क्या हो गया था? वो समझ नहीं पा रही थी! पहली बार जब उसके पति ने उस पर हाथ उठाया था, दंग रह गयी थी वो! कभी सोचा न था कि उसके साथ भी ऐसा होगा! सुना था, देखा भी था कि औरत को पति अपनी जागीर समझता है, कभी भी कुछ भी कर सकता है! पर स्वयं के साथ ऐसा हुआ तो भौंचक्की रह गयी वो!
'मैं इस तरह का व्यवहार बर्दाश्त नहीं कर सकती!'
'तो जा अपने बाप के घर, जिसने बाँध दिया है मेरे साथ तुझ जैसी को!'
'मुझ जैसी को? मुझ जैसी को? पढ़ी-लिखी हूँ! देखने में भी अच्छी हूँ! क्या खराबी है मुझ में?'
कुछ मजबूर कर रहा था अन्दर से उसे! सालों से पढ़ा सब पूरे वेग से बाहर आने को मचल रहा था!
'ज़बान लड़ाने की ज़रुरत नहीं! खाने में क्या है?'
'दाल, भिन्डी, रोटी, प्याज!'
'तंग आ गया हूँ मैं इस रोज़-रोज़ की दाल-रोटी से! कोई वरिएटी नहीं होती! कभी तो कुछ भिन्न बनाये कोई! पर इन्हें क्या फरक पड़ता है! इन्हें तो बस निबटाना होता है! डाल दिया कुत्ते की तरह आगे! लो खाओ और
बस!'
उसका मन तो किया कह दे, 'हाँ सही ही तो है !तुम भी तो कुत्ते की तरह ही भौंक रहे हो !' पर किसी चीज़ ने रोक लिया उसे! जाने क्या सोच कर चुप रह गयी!
समय के साथ यह सब बढ़ता गया! अब गन्दी गालियाँ भी हिस्सा बन गयीं थीं रात की बातों का! कोई ऐसा कटाक्ष नहीं था, जो वो अपनी पत्नी पर नहीं मारता था! कोई ऐसा व्यंग्य नहीं था, जो उसकी बातों का हिस्सा नहीं था!
तीर की तरह चुभती थीं उसकी बातें पर वो फिर भी उसकी बेवजह की बकवास सुनती थी!
दस मिनट में सब ठीक! मानो कुछ हुआ ही न हो! अब मतलब था! संभोग करना चाहता था पत्नी से! उसे तो होश ही नहीं था कि क्या -क्या कह गया था वो शराब के नशे में! पत्नी को तो यह मंज़ूर न था! एक मिनट में गाली-गलौच और अगले मिनट सब सही!
'हाँ-हाँ तुम क्यों मेरे साथ सोओगी. तुम्हारे साथ तो बहुत है न सोने वाले! जाओ उनके पास! उन्हीं के साथ रह भी क्यों नहीं लेती?'
पिघले सीसे सी उसकी बातें मन को छलनी करती अंतरात्मा तक उतर गयीं! उस रात भी बहुत कहा-सुनी हुई! पर वो अड़ी रही! जिस के लिए उसका मन नहीं वो क्यों करे वो सब?
उसे वो वक़्त भी याद था जब घर छोड़ कर चली गयी थी वो! बर्दाश्त से बाहर होता जा रहा था सब! सोचा था चली जायेगी सदा के लिए! दुनिया बहुत बड़ी है! कहीं भी रह लेगी! घर पर फ़ोन किया था कहने को कि वापिस नहीं आएगी कभी! बिटिया ने फ़ोन उठाया था!
'मम्मी, कहाँ हैं आप? कब आ रही हो? बिट्टू ने कुछ नहीं खाया और मैंने भी! पापा कहते हैं कि अब तुम्हारी मम्मी नहीं आएगी! खाना है तो खाओ! नहीं तो भूखे मरो! मेरी बला से!'
उलटे पैर लौट आई थी ऑटो कर के! बहुत हंगामा हुआ था! सबको इकठ्ठा कर लिया था उसके पति ने! कैसे हाथ जोड़-जोड़ कर माफ़ी मांग रहा था उसका पिता! भुलाए नहीं भूलता था वो मंजर! बिटिया और बिट्टू ऐसे चिपक गए थे जैसे कभी माँ से मिले ही न हों! बहुत कुछ कहना चाहती थी पर आवाज़ जैसे गले में दब कर रह गयी! जेठ-जेठानी,सास-ससुर, बुआ सास, किसी ने कसर नहीं छोड़ी! उसका पिता और ज़मीन में गढ़ता गया! माँ की आँखों से तो जैसे गंगा-जमुना बह निकली थी!
'लानत है तुझ पर जो अपने माता-पिता को इतनी ज़िल्लत का सामना करवाया!' वो मन ही मन खुद को कोस रही थी!
पति की हिम्मत बढती गयी! अब हाथ कम उठाता था पर जुबां से ज़हर टपकना बंद नहीं हुआ! बल्कि अब तो समय के साथ ज़हर बढ़ता ही जा रहा था! अब वो आगे से जवाब भी देती! परन्तु क्या फायदा! वो एक सुनाता, वो दो सुनाती, फिर दो के चार और चार के आठ! सुबह ऐसे कि रात कुछ हुआ ही न हो! वो भी सोचती, 'चलो कुछ देर तो राहत मिली!' जाने क्या डोर थी जिसने बाँध रखा था उसे उसके साथ! एक दिन बच्चों से कह ही दिया, 'अब न सह सकूंगी और! अब तो जाना ही होगा मुझे इस घर से!'
बिटिया की बात ने दिल छलनी कर दिया!
'हाँ-हाँ, तुम्हें कब किसकी परवाह थी जो अब होगी! तुम कभी किसी के लिए जी ही नहीं! बस अपना ही सोचा सदा! बाकी जाएँ भाड़ में!'
सन्न रह गयी थी वो! क्या बिटिया ने नहीं सुना था अपने पिता को कहते हुए बहुत बार, 'जा चली जा जहाँ जाना है! मुझे तुझ से कोई वास्ता नहीं!'
क्या उसने अपनी माँ का दामन आंसुओं से भीगा नहीं देखा था कई बार? क्या उसे नहीं पता था कि उसका पिता कहता था यह सब क्योंकि उसे पता था कि उसकी पत्नी का और कोई ठिकाना नहीं था? कहीं नहीं जा सकती थी वो अपने बच्चों को छोड़ कर!
बहुत हिम्मतवाली थी पर शायद वक़्त ने कमजोर बना दिया था उसे! या शायद दर्द को पहनते, ओढ़ते, दर्द उसके जीवन का हिस्सा बन गया था!
सांझ ढल रही थी! सूरज डूबने को था! उसे अपने डूबते चले जाने की तमाम बातें याद आती रहीं! पर अचानक आसमान में चांद चमकने लगा! तारे टिमटिमाने लगे! उम्‍मीदें अभी मरी नहीं थीं! रात तो थी पर सुबह की घोषणा करती हुई!
अंधेरा कितना भी हो, टिमटिमाते तारे राह दिखाते ही हैं----उसने सोचा!
सोचा और कदम मजबूती से चल पड़े! रास्‍ता उसका अपना था! जाना पहचाना! वह जानती थी इसे बरसों से! आज चलकर देख पा रही थी वह!
अपने फैसले कितना सुकून देते हैं------सच!!!!!!!!!!!!
September 2, 2011 at 1.08 A.M.



Tuesday, August 30, 2011

नोच-नोच खाता.....

हलकी सी आवाज़ हुई,
वो कांप गयी!
हाथ उठते-उठते रुक गया,
चेहरे का रंग फक पड़ गया!
'क्या मेरी जासूसी करती हो?'
जवाब कहते न बन पाया!
उसके शब्द-भेदी बाण,
नश्तरों की तरह सीने में उतरते रहे!!

उसे नोच वो चला गया,
उसके लिए कुछ न रह गया!
ग़मों की दोपहरी ओढ़,
स्वयें में सिमटी वो,
दुबक पड़ी रही!
स्याह काली रात के अँधेरे से घने
ग़मों तले दबी वो,
दिल की धडकनें रुकने का इंतज़ार करती वो!!!!
August 30, 1.34 A.M.

नायक और नेता.....

आज फिर खादी पहन कर निकला नेता,
'किसी चीज़ की कमी न होगी तुम्हें,' वो कहता!
खादी के मायने न समझता,
उसे बदनाम कर, अपनी जेबें भरता!
नायक खादी पहन दिखावा न करता,
केवल देश के लिए जीता, देश के लिए मरता!
न राजनीती का दम भरता,
न सत्ता के पीछे भागता!
सिर्फ आम आदमी के लिए लड़ता,
उसे इंसाफ दिलाने के लिए तत्पर रहता!
गर नायक है तुझे बनना,
नेता के पीछे मत भागना!
नेतागिरी से तो कुछ हासिल नहीं,
लोगों का नायक बन तो सब सही!
नेता जान बचाता भागता,
नायक के पीछे जहाँ चलता!!!!
August 30, 2011 at 12.23 A.M.
written after reading Jagjot Singh's post....
नेता और नायक में अंतर !
जो सत्ता के पीछे भागे वो नेता, और जिसके पीछे सत्ता भागे वो नायक, ..
नेता सदेव समाज को पीछे रख कर खुद आगे चलता है और नायक समाज के साथ चलता है..
नेता समाज की संपत्ति को स्वयं की मानता है, नायक स्वयं को भी समाज की संपत्ति मानता है

Sunday, August 21, 2011

आज़ादी..

PART--I

मंगल गाओ, दीप जलाओ,
मेरे जन्मदिन पर मुस्कुराओ!
मैं आया तो तुम खुली हवा में साँस ले पाए,
तुम्हारे सपने साकार हो पाए!
बहुत संघर्ष के बाद मिला हूँ तुम्हें,
मुझे यूँ ही न खो देना!
रहूँगा साथ हर समें,
मुझे अपने दिल से न बिसरा देना!!!!

PART--II

अपने लहू से सींचा जिन्होंने हिंद की आज़ादी को,
आज उन से देश पर मिटने वाले सिरफिरे कहाँ हैं?
खादी पहन जिन्होंने अपने देश की आन बचाई,
आज होती है उसी खादी की रुसवाई!
पहन कर खादी निकलते हैं नेता शान से,
कितने गिर गए हैं सब अपने ईमान से!
कहते थे देश के लिए मर-मिटेंगे,
मुकर गए हैं आज अपनी जुबान से!
खा गए देश को, खोखला कर दिया सोने की चिड़िया को,
कहते हैं फिर भी गर्व है हिन्दुस्तानी होने पे!!!!!

PART--III

रस्मों-रिवाजों में जकड़ी,
मैं आज़ादी से पहले आज़ाद थी!
गाँधी संग चल,
मैं स्वदेश का हिस्सा थी!
आज भी मैं उन्हीं रस्मों में जकड़ी हूँ,
पर आज कोई गाँधी नहीं,
जो मुझे स्वदेशी की राह पर ले जाए!
किसका साथ दूं , किस आन्दोलन में,
छलनी है सीना देश का भ्रष्टाचार से!
आज प्रण लेती हूँ दिल से,
बदलाव लौंगी अपने विचारों से!
रस्मों-रिवाज़ भी दबा न पायेंगे मन के वेग को,
आज लड़ना है देश के भ्रष्टाचार से!!!!
August 15, 2011 at 10:12 A.M.

CLOSURE....

Have never doubted the uncrtainty of life. However, yesterday its uncertainty hit with gale force. Came to know about the untimely demise of a former classmate and friend. Couldnot believe it then and the mind refuses to accept it even now. Young, smart, handsome, intelligent. Kafka, Nietzche, Pink Floyd were the mantras he lived by. Laughter could readily reach his eyes in those days. Serious talks, jokes: you name it and his contribution was there. Life was moving at its easy pace and nothing seemed amiss. The walks in the University, the sessions in the canteen, the motor cycle rides: what could go wrong! A free spirit, he was always looking for freedom of thought and action. No one felt that he would not achieve what he wanted. Over the years, everyone went their own way. Contact diminished. News about him filtered through sources. Some true, some untrue(that is what one would like to believe about one's friends, isn't it?). University trips meant that I would certainly get to meet him. Over the years he had changed. Laughter had changed to a smile which would rarely reach his eyes. Conversation was not so easy. Always felt I did most of the talking. A couple of more years and the smile was a mere twitch of the lips. There was no question of the twitch being reflected in the eyes. Laboured conversation. Perfunctory at the best. Friendly hug was ever full of self-consciousness. A hint of the old self when he said jokingly--'The professors will be scandalized if they see you in my room.' 'Hey come on, the door is open and everyone knows that we studied together.' Nothing futher. Usual small talk. Time for good bye. At that time, did not know that I would not get to see him ever.
More news filtered through. Not much of it were rumors. What had happened! Where had the carefreeness gone? Had life taken such a toll on him that nothing of his old self remained? Had cut off from everyone. Lonely existence sans those who could care about him. Did he want it that way or was there another reason? What demons were he fighting that he could never talk about them to anyone? What drove him to that? Of course, there would be no answers. Not any more. Always wanted to ask him things. Never got the opportunity for that. Too many things left unsaid. Too many questions went unanswered. What goes on behind closed doors, no one knows.He has taken his demons, his secrets, his sorrows, his lack of freedom and independence with him.
His death has shaken, rudely shocked. Cherish your friends. Talk to them. Be there for them. Communicate. And have closures if such a need arises.
August 12, 2011 at 6:35 P.M.

Monday, August 8, 2011

बोलती रही चुप्पी...

बहुत कह चुके थे एक दूसरे को,
बहुत सुन चुके थे एक दूसरे को!
शब्दों के कई अर्थ निकाल,
अब दोनों शब्दों का आवरण उतार,
निशब्द खड़े थे इक दूजे के साथ!
अब उनकी चुप्पी बोल रही थी!
शायद अब उन्हें शब्द नहीं चाहिए थे,
अपने रिश्ते को और मज़बूत करने के लिए!
अब तो चुप्पी वो सब कह रही थी,
जो कभी शब्द न कह पाए!
अब वो और उनकी चुप्पी,
चल रही थी दाल हाथों में हाथ!
शब्दों का क्या काम था उनके बीच,
जब चुप्पी ने कह दिया था सब!!!!
August 8, 2011 at 6.04 PM.

गहराया अँधेरा.....

अँधेरा और घना होता चला गया,
उसका अस्तित्व उस में गुम होता गया!
काला स्याह अँधेरा,
मन के भीतर छिपे असुरों सा,
अपने वेग से सब लुप्त करता गया!
कुछ न रहा, कुछ न बचा,
सब अँधेरे की भेंट चदता गया!
इतना गहराया अँधेरा,
कि सुबह होने का गुमां न रहा!
अपने संग सब ले,
अपने में सब समेट,
अँधेरा गहराता गया,
उसके अस्तित्व को ख़त्म करता गया!!!
August 8, 2011 at 3:50 P.M.

छिपा दर्द....

आँखों में चमक थी,
चेहरे पर खूबसूरत मुस्कान!
निगाहें हट ही नहीं रहीं थी,
उस चेहरे की आभा से!
जाने कहाँ से आया इक जोहरी,
कहा-मुझे है चेहरे के भावों की पहचान!
इक टक देखता रहा उसकी ओर,
लगा कि कहीं है दिल में चोर!
उसके करीब गया,
मन की निगाह से देखा!
पाया कि हँसी के तले,
आँखों की चमक के पीछे,
इक गहरी उदासी थी छाई!
दुनिया से छुपा अपना दर्द,
सदा थी मुस्काई!
किसी ने न भीतर झाँका,
न देखी मन की रुसवाई!
सब ने देखा हँसी का मुखोटा,
न देखी मन की रुलाई!
इसी मुखोटे को ओड़े, पहने,
उसने ज़िन्दगी बितायी!
August 8, 2011 at 12:42 A.M.

Sunday, August 7, 2011

विडम्बना........

औरत पीये तो छुप कर, मर्द पीये तो खुल कर!
औरत पीये तो शर्मिंदगी, मर्द पीये तो मर्दानगी!
औरत पीये तो संस्कृति के खिलाफ,
मर्द पीये दिन-रात बेबाक!
औरत पीये तो जीना हराम,
मर्द पीये सरे आम!
कैसी विडम्बना है रे समाज,
मर्द पीये तो सही,
औरत पीये तो चरित्र खराब....
August 7, 2011 at 9.28 P.M.

Thursday, August 4, 2011

सपना के सपने

सपना ने कई सपने देखे होंगे
अपनी इस कच्ची उम्र में!
गुडिया से खेलेगी,
उसका ब्याह रचाएगी!
उसे क्या पता था,
कि सब सपने सपने ही रह जायेंगे!
उसे न तो गुडिया ही मिली,
न ही उसका ब्याह रच पाया!
उसके हाथ में थमा दी झाड़ू,
बचपन उसका खो गया कूड़े में!
न गुडिया न किताब,
उसके दुःख का नहीं कोई हिसाब!
पर, क्या वो जानती है
कि वो दुखी है?
उसे क्या मालूम कि गुडिया क्या और किताब क्या?
उसके लिए तो झाड़ू ही उसके जीवन की वास्तविकता है!!!!
August 4, 2011 at 5.54 P.M.
(inspired by maya mrig's post--कितनी अच्‍छी है काम वाली बाई की छह साल की बेटी सपना---खेल-खेल में पूरे घर का झाडू़ पौछा कर डालती है---)

Sunday, July 31, 2011

तुम्हारी सच्चाईयाँ.....

तुम्हारी सच्चाईयाँ मेरा हक़ थीं,
तुम इनसे कब ग़ुरेज़ करने लगे!
मेरे हक़ों को तुमने फ़र्ज़ के नाम दे दिए,
मैंने तब भी उफ्फ़ नहीं की!
फ़र्ज़ तो सब पूरे कर दिए,
अब मुझे मेरे हक़ों के लिए जीने दो!
नहीं माँगती तुमसे कुछ इस के सिवा,
अपनी और मेरी सच्चाइयों संग,
मेरे हक़ों और तुम्हारे दिए फर्जों संग,
मुझे खुली हवा में सांस लेने दो!
इस विशाल आसमां तले,
जी भर जी लेने दो!!!
July 31, 2011 at 10.39 A.M.
(This poem is inspired by Maya Mrig's status:
ये सच थे कुछ-- मैंने हक की तरह चुन लिए---ये बचे हैं जो---तुम फर्ज की तरह सहेज लो--)

Monday, July 25, 2011

अनजानी डगर....

तुम और मैं,
दो हैं,
पर दो नहीं!
एक होने की कोशिश!
दो अधूरे,
पूरे होने के लिए,
एक दूसरे का हाथ थामें,
निकल पड़े हैं,
इक अनजानी डगर की ओर,
जिसका रास्ता काँटों से हो कर गुज़रता है,
जिसकी मंजिल का पता नहीं!
फिर भी चल पड़े हैं साथ,
उस अनजानी मंजिल की ओर,
जो ले जाती है समय से परे,
कहीं दूर,
एक अजीब से संतोष की ओर,
जिस में न दुःख है,
न तकलीफ,
बस इक दूसरे का साथ है!
July 25, 2011 at 4.39 P.M.

हारकर देखा कभी----?

वो उसकी तरफ देखता रहा,
वो भी देखती रही!
वो नज़रें झुका, चली गयी,
वो तब भी उसकी तरफ देखता रहा!

बरसों बाद वो अचानक सामने दिख गयी,
समय के थपेड़ों से थीं झुरियाँ पड़ गयीं!
मन में इक कसक सी उठी,
'शायद गर मेरे साथ होती, तो यूं लुटी-लुटाई न दिखती कभी!'

सोचता रहा उसके बारे में दिन भर,
आदमी ने क्या पाया उसे हरा कर?
कहता है कि हारता हूँ उस से सदा,
नहीं जानता कि है हकीकत क्या?

औरत को हरा, खुद से न जीत पायेगा कभी,
नहीं जानता क्या ये अभी भी?
क्या औरत की हार, क्या मर्द की जीत,
हार-जीत का भी है इक अतीत!
July 25, 2011 at 1.55 P.M.

Friday, July 22, 2011

तुम क्‍या जानो?????

औरत हँसे तो बेहयाई,
मर्द हँसे तो वाह तेरी खुदाई!
मेरे हँसने भर पर भी कटाक्ष करते हो,
स्वयं कितने अस्वीकार्य काम करते हो!
चिल्लाते हो गर ऊँगली में दर्द हो,
दर्द की परिभाषा तुम क्या जानो!
अधिक दर्द है तुम्हारे व्यंग्य में,
जो नहीं पाया था तुम्हें पैदा करने में!
July 22, 2011 at 5:38 P.M.
This poem is inspired by Maya Mrig's post:
वह हंसा---खुली हंसी--- (वाह कितना हंसमुख है, खुले दिल का)
वह हंसी--- खुली हंसी----(कितनी बेहया है, शर्म तो बेच खाई इसने)

अनुगामी

वो बोलता रहा,
वो सुनती रही!
वो शब्दों के नश्तर चलाता रहा,
वो चुप सहती रही!
"मेरी बांदी है तू," वो बोला!
उसने फिर भी अपना मुँह नहीं खोला!
"मेरे पीछे चलना है तकदीर तेरी!"
उस ने तब भी आँखें नहीं फेरीं!
"कुछ कहती क्यों नहीं?
क्या मुँह में जुबां नहीं?"
उस ने फिर भी कुछ न कही!
अचानक मुड कर देखा,
तो पैरों तले ज़मीन निकल गयी!
वो लहू-लुहान पैरों से,
उस के साथ चल रही थी!
फिर वो उस से आगे निकल गयी!
उस की हिम्मत जवाब दे गयी!
जानता था अब न रोक पायेगा उसे,
क्योंकि वो चल पड़ी थी उन ख्वाबों के पीछे,
जो थे कब से उस के मन में बसे!
July 22, 2011 at 1:25 P.M.

मेरी कविता......

रूढ़ीवाद तले दबी मेरी कविता,
ढूँढती अपनी अस्मिता!
हर शख्स इसका गला घोंटने को तत्पर,
सब जुटें हैं इसको मारने परस्पर!
नहीं चाहते कि इसकी आवाज़ हो,
माँगते इसका अस्तित्व ख़त्म हो!
आवाज़ होगी तो ध्यान भी देना होगा,
इसे सुन कुछ करना होगा!
कहते हैं चुप रहो,
सब मुँह बंद किये सहो!
तुम्हें हक नहीं कि तुम कुछ कहो,
तुम केवल अंतर्मन के बंद कमरों में रहो!
मैं कैसे अपनी कविता की आवाज़ बंद कर दूं,
क्यों न उसे बाहर आने दूं?
मेरी कविता मेरी पहचान है,
मेरे साँस लेने का सामान है!
दबा लो जितना चाहे मेरी कविता को,
वो बाहर आएगी तुम्हें झंझोड़ने को!
बच न पाओगे उसकी आवाज़ से,
भेद देगी तुम्हें अपने अंदाज़ से!
अब दबा न पाओगे मेरी कविता को,
तुम चाहे जितनी कोशिश कर लो!
मेरी कविता है तो मैं हूँ,
और मैं हूँ तो संसार है!!!!
July 20, 2011 at 11:57 A.M.

राजीव---ये सब क्या है? क्यों है?

राजीव---ये सब क्या है? क्यों है?
नीनू---इस लिए क्योंकि हमें इसी तरह इस जीवन को जीना है!
राजीव---तुम, तुम क्यों हो?
मैं मैं क्यों हूँ?
नीनू----तुम और मैं हैं तभी तो यह दुनिया है,
नहीं तो सब वीराना है!
राजीव---सब कुछ अजीब है, जिस का जैसा नसीब है!
वही वो पता है, कुछ न ले जाता है!
अपना अपना नसीब है,
कोई गरीब है, कोई अमीर है!
कोई भूखा रहता है,
कोई खता खीर है!
नीनू----ईश्वर की बनायी दुनिया है,
लेता भी वही और वही देता है!
जो नसीब है वही मिलता है,
इंसान के चाहने से क्या होता है!
राजीव---हम सब कठपुतली हैं,
डोर उस के हाथ है!
दिखता किसी को भी नहीं,
पर हर पल साथ है!
किसी को बनाता है,
किसी का विनाश है!
नीनू---ऐसी ही दुनिया है
ऐसे ही चलेगी
हमें तो बस चलना है
डोर चाहे उसके हाथ है!!!!
July 19, 2011 at 6:28 P.M.

Wednesday, July 20, 2011

मेरी कविता....

रूढ़ीवाद तले दबी मेरी कविता,
ढूँढती अपनी अस्मिता!
हर शख्स इसका गला घोंटने को तत्पर,
सब जुटें हैं इसको मारने परस्पर!
नहीं चाहते कि इसकी आवाज़ हो,
माँगते इसका अस्तित्व ख़त्म हो!
आवाज़ होगी तो ध्यान भी देना होगा,
इसे सुन कुछ करना होगा!
कहते हैं चुप रहो,
सब मुँह बंद किये सहो!
तुम्हें हक नहीं कि तुम कुछ कहो,
तुम केवल अंतर्मन के बंद कमरों में रहो!
मैं कैसे अपनी कविता की आवाज़ बंद कर दूं,
क्यों न उसे बाहर आने दूं?
मेरी कविता मेरी पहचान है,
मेरे साँस लेने का सामान है!
दबा लो जितना चाहे मेरी कविता को,
वो बाहर आएगी तुम्हें झंझोड़ने को!
बच न पाओगे उसकी आवाज़ से,
भेद देगी तुम्हें अपने अंदाज़ से!
अब दबा न पाओगे मेरी कविता को,
तुम चाहे जितनी कोशिश कर लो!
मेरी कविता है तो मैं हूँ,
और मैं हूँ तो संसार है!!!!
July 20, 2011 at 11.53 A.M.

Monday, July 18, 2011

लम्हा लम्हा गुज़र बने ख्वाब.....

तुम्हारे साथ बिताये अच्छे-बुरे लम्हे,
आज भी मुझे गुद-गुदा जाते हैं!
हर लम्हा एक मीठी याद,
कुछ अपने में लिए कडवी, खट्टी याद!
कुछ हँसाते लम्हे, कुछ रुलाते,
सब मुझे हैं याद आते!
तुम्हारा नाम याद करते ही,
होठों पे खिल जाती है हँसी सी!
गहरे आसमान पर सितारों का निखार है,
जानती हूँ कि तुम भी उन्हीं सितारों को देख रहे हो!
आँखें बंद कर दिल खुश होता है,
कि ख्वाबों में तुम आओगे, मुझे है यकीं!
ख्वाबों में इक बार फिर जीती हूँ,
तुन्हारे साथ बिताया हर लम्हा!
होठों से लेती हूँ तुम्हारा नाम,
हवा के परों पर सवार,
जब तुम तक पहुँचता है,
क्या तुम भी मुस्कुराते हो?
हवा फुसफुसाती है तुम्हारा नाम,
हर लम्हे में बसी है तुम्हारी याद!
लम्हे बन गए हैं ख्वाब,
ख्वाब हैं लम्हे!
अब तो आ जाओ मेरे पास,
कि ख्वाब हो हकीकत,
और हर लम्हा हो लाजवाब!!!!
July 18, 2011 at 8.39 P.M.

झरोखा

बंद कमरे में क्षत-विक्षित पड़ी नारी
तार-तार, लहू-लुहान,
हसरत से उस झरोखे को ताकती,
जिस में से आया था आज़ादी का झोंका कभी!
आज मर्द ने फिर से अपनी मर्दानगी दिखाई,
उस झरोखे को बंद कर अपनी ताक़त दिखाई!
कहा, "तेरी नियति यही है,
तू बंद कमरे में रह!"
घुट-घुट मरती रही वो,
खून के आंसूं पीती रही वो!
खुली हवा में सांस लेना चाहती थी वो,
आज केवल मर्यादा निभाती,
जीना भूल चुकी है वो!!!
July 14, 2011 at 12:14 P.M.
[this poem is inspired by Maya Mrig's post---बंद कमरे में गलती से छूट गया झरोखा आज बंद कर दिया, अब तू रक्षित है, यह तेरी मर्यादा है स्‍त्री....Thursday(July 14, 2011) at 10:26a.m.]

तुम्हारी खुशबू ........

महसूस करता हूँ उस खुशबू को आज भी,
जो थी मेरे साथ कभी!
सोचा था ता-उम्र मेरे साथ रहेगी,
मेरी ख्वाहिश दिल में ही रही!
आज हूँ सोचता,
बचपना था उस बात में दीखता!
आज इस मोड़ पर,
जानता हूँ तुम्हारी खुशबू मेरे साथ है!
हवा के हर झोंके में,
हर फूल की खुशबू में,
पत्तों की सरसराहट में,
तुम्हारी सांस की खुशबू है!
बारिश की हर बूँद में,
ओस की एक-एक बूँद में,
तुम्हारी खुशबू है!
तुम्हारी खुशबू के झोंके,
आज भी हवा के झोंकों संग,
मेरे साथ हैं,
हमेशा के लिए!!!!
July 18, 2011 at 10.57 A.M.
महसूस करती हूँ उस खुशबू को आज भी,
जो थी मेरे साथ कभी!
सोचा था ता-उम्र मेरे साथ रहेगी,
मेरी ख्वाहिश दिल में ही रही!
आज हूँ सोचती,
बचपना था उस बात में दीखता!
आज इस मोड़ पर,
जानती हूँ तुम्हारी खुशबू मेरे साथ है!
हवा के हर झोंके में,
हर फूल की खुशबू में,
पत्तों की सरसराहट में,
तुम्हारी सांस की खुशबू है!
बारिश की हर बूँद में,
ओस की एक-एक बूँद में,
तुम्हारी खुशबू है!
तुम्हारी खुशबू के झोंके,
आज भी हवा के झोंकों संग,
मेरे साथ हैं,
हमेशा के लिए!!!!

Sunday, July 10, 2011

मैं रेत, वो पानी.....

उसके होने से मैं हूँ,
वो नहीं तो अपना वजूद ढूँढता हूँ!
उसके होने से आबाद हूँ,
आज उसके जाने से जर्जर पड़ा हूँ!
तपती रेत से पड़े छालों में इतनी तासीर न थी,
जितने गहरे ज़ख्म उसके जाने ने दिए!
आज जब वो नहीं तो मेरा अस्तित्व नहीं,
बांसुरी बिन कान्हा, कान्हा नहीं!
मैं रेत, वो पानी,
मेरे ऊपर गिरती और विलुप्त हो जाती!
सोचता था ठंडक देगी मुझको,
चली गयी और झुलसा मुझको!
आज वो नहीं,
तो कुछ नहीं!
जानता था रेत और पानी का मिलन न होगा कभी,
पर दिल कहता था थोड़ी देर देख ले अभी!
अब मैं हूँ और मेरी तन्हाई,
और जिसे कभी मेरी याद न आई,
आज उसे याद कर रोता हूँ अकेले में!!!
July 10, 2011 at 12.44 A.M.
PART----II
रेत पर गिर पानी उस में समां जाएगा
उस में विलीन हो, उसका हिस्सा बन जाएगा!
फिर न पानी रहेगा, न रेत,
इक दूसरे का वजूद अपने में समेत,
दोनों हो जायेंगे एक!!!! (8.43 P.M.)
Part III
जब मिल जायेंगे दोनों, रेत और पानी,
लिखेंगे फिर नयी कहानी!
पानी समां रेत में,
समझेगा खुद को गौर्वन्वित,
अपनी हस्ती मिटा,
उसकी हस्ती में मिल,
रहेगा सदा हर्षित!!! (8.52 P.M.)

Thursday, June 23, 2011

पिता का आँगन

जिस दिन आप इस दुनिया से गए,
मेरी दुनिया सूनी कर गए!
न साँस आ रही थी, न आवाज़ ही निकल रही थी,
सब सुन्न पड़ गया था, ज़िन्दगी थम सी गयी थी!

आपका जाना स्वीकार नहीं कर रहा था दिल-ओ-दिमाग,
क्यों चले गए आप?
आँखें आँसुयों से भर जाती हैं,
जब यादें आपकी मौत की आती हैं!

आपके आँगन में खेली,
पढ़-लिख बड़ी होली!
फिर एक दिन आपने अपने दिल के टुकड़े को ब्याह दिया,
आँसुयों ने दोनों के दामन को भिगो दिया!

आज आपकी बिटिया अकेली है,
क्योंकि उसका हाथ पकड़ने वाला कोई नहीं है!
बहुत याद करती है आपको आपकी बिटिया,
आपके बारे में सोच रोती है आपकी बिटिया!

बस इक बार आ जाओ फिर से,
मुझे प्यार से बुला, सहला, चले जाना फिर!
बस यही मांगती हूँ दिल से,
मुझे प्यार से बुला, सहला, चले जाना फिर!
मुझे प्यार से बुला, सहला, चले जाना फिर!
June 23, 2011 at 1.00 A.M.

Sunday, June 19, 2011

Freedom

The play of light and dark.
Clouds with life-like shades of grey,
Waiting to kiss the horizon.
Looking beyond!
Oh,there is hope yet.
Do not fret!
Nothing lasts forever.
This too shall pass!
Hidden behind them is the sun,
Light,warmth and life,
Holding all that in the palm of his hand.
Yet,the clouds harbour rain in their bowels.
Ready to drench the Earth with their elixir.
Ah!The freedom!
The emancipation!
If only I too were a cloud!!!!
September 8, 2010 at 5:13 P.M.

कड़वा सच

माँ की तस्वीर पर, बेटे ने प्लास्टिक का हार चढ़ा दिया,
इस मंज़र ने पिता का दिल दहला दिया!
बहू तुनक कर बोली, "गंदा भी नहीं होगा,
सिर्फ इतवार को ही धोना होगा!"
पिता का दिमाग सन्न पड़ गया,
दिल की धड़कन को लकवा मार गया!
"बेटे तुमने यह क्या कर दिया?"
"पिताजी रोज़-रोज़ के ताज़े हार का खर्चा बच गया!"
"बेटे उस ने तुम्हे जन्म दिया था!"
"पिताजी, मैंने सब क़र्ज़ उतार दिया था!"
पिता वहाँ से चला आया,
दिल में था दर्द समाया!
सोचा, शायद यही नर्क मुझे था भोगना,
तभी नहीं मिला मौत का बिछौना!
शायद यही देखने के लिए जिंदा हूँ,
पत्नी की तस्वीर पर प्लास्टिक के हार को देख शर्मिंदा हूँ!!!!
June 19, 2011 at 12.43 A.M.

Wednesday, May 18, 2011

जीवन तीखी गंध.....

उसकी गली से गुज़रा
खिड़की की ओट से झाँकता उसका चेहरा
दिल पर जादू सा कर गया
नज़रों से नज़रें मिलीं
एक ही नज़र में कई वायदे हो गए
हवा में बिखरी उसकी खुशबू
मैं साथ ले आया
आज जब उससे मिल नहीं पाता
यही खुशबू तीखी गँध बन अब
हर वक़्त मेरे साथ है!!!
May 18, 2011 at 9.22 P.M.

Tuesday, May 10, 2011

चाँद....

इक चाँद आसमान में है
इक मेरे पहलू मैं
आसमान का चाँद धीरे-धीरे फ़ीका पड़ता हुआ
मेरा चाँद अभी भी अपनी मादक आँखों से
मुझे मदहोश करता हुआ
आसमान का चाँद घटता, बढ़ता
मेरा चाँद अपने में पूरन,
मेरा पूरक
आसमान का चाँद बेजान, ख़ामोश
मेरा चाँद मेरी जान
मेरे आग़ोश में
मुझे हम दोनों के होने का एहसास दिलाता!!!!
May 10, 2011 at 8.15 P.M.

Saturday, April 30, 2011

teri beparwayihaan/तेरी बेपरवायिआं

teri beparwayihaan ne hi te maar ditta
main tarle kar-kar haari haan.
je toon nahin si dena pyar mainu
kyon meriyaan waadhaiyaan saan!!!
तेरी बेपरवायिआं ने ही ते मार दित्ता
मैं तरले कर-कर हारी हाँ!
जे तूँ नहीं सी देना प्यार मैनू
क्यों मेरियाँ उमीदाँ वधाइयां सन!!!
April 30, 2011 at 2.02 P.M.

तेरा साथ......

सब कुछ है फिर भी न जाने किस चीज़ की कमी है?
तेरे साथ हूँ सदा, फिर भी क्यों तन्हाई है?
खिलखिलाता हूँ तेरे साथ और हँसता भी तेरे साथ,
फिर भी न जाने क्यों हर रात आँखों में नमी है?
तुम हो फिर भी न जाने क्यों दिल का दरवाज़ा बंद है?
अब यह एहसास है,
कि तुम हो मेरे साथ,
पर मैं फिर भी अकेला हूँ!!!!!
April 30, 2011 at 9.33 A.M.

Wednesday, April 27, 2011

भ्रष्टाचार

रूस हमारा मित्र है
उसके उधाहरण का पालन करना है!
गर रूस है भ्रष्टाचार में सबसे आगे
तो हम क्यों न उसके पीछे भागें?
भ्रष्टाचार है नारा हमारा
पैसा खायेंगे सारा का सारा
मेहनत से घबराते नहीं
हमने तो नहीं कहा हम खाते नहीं
हर कदम भ्रष्टाचार के लिए बढ़ाएंगे
अपने देश के लिए नाम कमाएंगे!!!!
April 27, 2011 at 8.05 P.M.

Monday, April 25, 2011

बूंद सी जिन्‍दगी

बादलों की गर्जन हुई,
एक पल के लिए उसका दिल कांप गया!
संकुचाई सी,
अपने प्रियतम के आगोश में समां गयी!
उसकी छाती से लग,
धड़कन और बढ़ गयी!
होंठों की कंपन बढ़ी,
नज़रें झुक गयीं!
पर उसने अपना दामन झटक लिया!
उसके प्यार को रुसवा कर दिया!
होठों की कंपन में उसे लाचारी दिखी!
झुकी नज़रों में बेचारगी दिखी!
उसके प्यार को समझ न पाया,
अकेला उसे छोड़ चला गया!
बादलों की गर्जन से,
अब दिल डरता है!
बारिश की बूंदों से,
मन पिघलता है!
होंठ मौन हैं अब,
आँखें वीरान सी,
झुकती नहीं!
वो मूरत है अब पत्थर की,
प्यार के लिए दे दी जिसने ज़िन्दगी!!!!
April 25, 2011 at 6.36 P.M.

Friday, April 22, 2011

विचारो-एहसास

मन में उत्पात मचाते विचारों को,
दिल की गहरायिओं में छिपे एहसासों को,
कागज़ पर उतारते हैं!
विचारो-एहसास शब्द बन जाते हैं!
कुछ अपने लिए,
कुछ दूसरों के लिए,
इन्हीं शब्दों के सहारे,
जीए चले जाते हैं!!!
April 22, 2011 at 9.15 A.M.

Wednesday, April 20, 2011

Pehchaan

tumhaari pehchaan tum khud ho
khud ko dhoondoge to apni pehchaan bhi mil jaayegi.
April 20, 2011 at 10.26 P.M.

Tuesday, April 19, 2011

तुम..

तुम हो भी साथ
और नहीं भी
सामने भी हो
और आँखों से ओझल भी
तुम्हारे शब्दों को समेट
अपनी झोली में
चली आई
कि जब तुम नहीं
तो तुम्हारे शब्दों के साथ
वक़्त गुजरेगा
अच्छे, बुरे,
प्यार भरे,
कुछ अपने में कई कटाक्ष लिए
कुछ अपने में मेरा पूरा संसार समेटे
तुम्हारे साथ की दुहाई देते
पर यह दिल है कि कहता है
कि तुम नहीं हो
कहीं नहीं हो.....
April 19, 2011 at 5.23 P.M.

अंतर्द्वंदव्

अंतर्द्वंदव् से जूझते
जीवन की डगर पर चलते
कभी हब्शी
कभी मानस
कभी पत्थर
कभी पारस
कभी इन्सां
कभी भगवान्
अपनी पहचान खोजते
सब चलते जा रहे हैं
बस चलते..
April 19, 2011 at 4.26 P.M.

Thursday, April 14, 2011

Concrete Jungle

Concrete jungle,
smothering life.
Huge, steel chimneys,
spewing out smoke,
suffocating.
Nights foggy,
days smogy.
Buildings mere structures,
strangling everyone in their wake.
Noisy streets,
stifling voices.
The fragile frame of psyche,
being killed steadily.
Asphyxiated life,
no respite,
no recourse,
but to die sluggishly.
April 14, 2011 at 10:21 P.M.

Sunday, April 10, 2011

Who Am I?

Who am I?
Am I who I think I am?
Or, am i who others think me to be?
Or, am I actuaaly who I am?
I am three persons rolled into one.
The one I think I am
The one others think I am.
And, the one I actually am.
June 27, 2001 at 12.42 A.M. London time

उदारता

उसकी रज़ा मान,
मैं चलती रही!
न पैरों के छाले देखे,
न उनसे रिसता खून ही दिखा!
छलनी हाथों से राह के,
काँटे हटाती रही!
जानती थी वो मेरे साथ है!
छालों से रिसता खून मेरा न था!
हाथों में काँटों की चुभन भी मेरी न थी!
जानती थी की वो दयावान है!
मन में उसकी उदारता का विश्वास लिए,
मैं चलती रही!!!!
April 10, 2011 at 5.36 P.M.

Thursday, April 7, 2011

सपने बस सपने....

मंद हवा की तरह
गालों को सहलाती
तितली की तरह
यहाँ से वहाँ उड़ती फिरती
एक अल्हड़ मौज
जो किनारे को छू लौट आती
मन में जवानी की लहक
आखों में यौवन की चमक
साँसों में जीवन की महक
इसी लहक, महक, चहक में
बचपन कहीं पीछे छूट गया
उड़ती आज भी हूँ
पर पंखो का रंग फीका पड़ गया है
चहकती हूँ
पर दर्द छुपा नहीं पाती
जीवन की सड़न है
अब महक में
टूटे हुए सपने
रिसते हैं हर पल
April 07, 2011 at 4.14 P.M.

Wednesday, March 30, 2011

WORLD CUP

more than a game/
is par tika hai desh ka name/
haarenge ya harvaayenge/
yeh to Pita Samay hi bataayenge/
desh ki hai lalkar/
CUP ho hamara phir ek baar/
paani na pher dein desh ki umeedon par/
dua karte hain Ishawar se jod dono kar/
jeeto India jeeto, desh tumhaare saath hai/
ab Cup diwaana tumhaare haath hai!!!
March 30, 2011 at 8.14 A.M.

Wednesday, March 23, 2011

Winding Roads

The winding roads,
the never-ending lanes,
where are they going?
Are they leading somewhere?
Maybe to everyone's destination?
Is there a light at the end of the path?
A home and a warm embrace one can go to?
A warm hearth,
a loving kiss,
isn't that what all of us are
looking for, at the end of the road?
A loving smile would make the day,
and take all the tiredness away.
Yes, the winding roads would come to an end.
And, lead me to a place,
where I am wanted and loved,
I am sure of that.
Home is where the hearh is.
And, that very faith,
keeps me going,
through these winding roads.
(written on June 26, 2001 at 4.44 P.M. London time)

अजनबियों का शहर

जो आज है अजनबी
वही बन जाता हमसफ़र इक दिन
साथी बन साथ निभाता
मंजिल तक चलता
अपनी लगती ज़मीन
करीब आसमां
न ज़माने के ठुकराए जाने का खौफ़
न आसमां से कोई रंजिश
अजनबियों के शहर को
हमसफ़र ने बना दिया अपना सा!!!
March 23, 2011 at 12.52 P.M.

जाग के कटी सारी रैना

जो 'जाग के कटी सारी रैना'
पलकें एक पल को न झपकीं
नैनों ने जो सपने देखने थे
वो उनसे रहे कोसों दूर
न जाने क्या ढूँढ़ते रहे नैन रात भर
कि दिल के ज़ख्म न आये भरने पर!!!
March 23, 2011 at 11.21 A.M.

Monday, March 21, 2011

जंग

मैं जो कर रहा हूँ,
क्यों कर रहा हूँ?
क्या यही मेरी नियति है?
क्या मुझे यही करना था?
यही करना चाहिए?
या शायद कुछ और?
भीतर बाहर का अँधेरा,
एक-दूसरे को टोकते,
लड़ते,
बेकरार
शायद दोनों एक ही हैं!
मेरे ही चुने हुए!
शायद रौशनी अभी दूर है!
शायद यही नियति है!
शायद यही रौशनी!!!!!!!!!!
March 21, 2011 at 5.12 P.M.

Saturday, March 19, 2011

Embodiment of Life

Sense
Sensory
Sentimental
Sensitive
Origins of human experience
Sensational
Sensuous
Directly embodied experiences
Significant
Expressive
Participate
In the ongoing world experience
Insistence on being alive
Reinforcement of life.
March 19, 2011 at 7.01 P.M.

होली के रंग

नीला भरोसेमंद, प्रतिबद्ध
देता विश्वास को शब्द
हरा रखे मन को शाँत
और दे विचारों को ताज़गी
पीला है आशावाद, प्रबोधन और ख़ुशी का प्रतीक
नारंगी देता गर्मजोशी और बढाता आत्मविश्वास
लाल भरे मन में उत्साह
बैंगनी दे रहस्यवादी भावना
भूरा दे स्थिरता, विश्वसनीयता
सफ़ेद से होती पवित्रता, तटस्थता
ग्रे कालातीत, ठोस, व्यावहारिक
काला संभावित रहस्यमयता को बढ़ाता
होली के रंग डालते जीवन में प्राण
खुशियाँ लाते ढेर
बढ़ाते मेल
खेलो रंगों भरी होली
मौज-मस्ती, भाँग की टोली
आओ खेलें हमजोली
रंगों के साथ मैं भी तुम संग हो ली!!!
March 19, 2011 at 3.04 P.M.

Saturday, March 12, 2011

Savage

A Savage has been unleashed,
From the bowels of the Earth.
Devouring everything in its wake,
Life has been left at stake.
Devastation all around,
Nothing but debris on the ground.
The monster brought with it huge waves,
Which no human could brave.
The two-headed demon killed quickly,
Taking with him the weak and the sprightly.
Earth and Water joined hands,
To show the Death-dance with their demonic wands.
Lives lost, people missing,
The snake of devastation, forever, hissing.
World watches in pain,
As man tries to pick up the pieces again.
March 12, 2011 at 11.01 A.M.

Sunday, February 27, 2011

ਹੰਝੂ--hanjhu

hanjhu kende ne mere dil da haal
o bekhabr muskra ke kolon lang gaya!!!
ਹੰਝੂ ਕੇਂਦੇ ਮੇਰੇ ਦਿਲ ਦਾ ਹਾਲ
ਓ ਬੇਖ਼ਬਰ ਮੁਸਕਰਾ ਕੇ ਕੋਲੋਂ ਲੰਗ ਗਯਾ!!!!
february 27, 2011 at 10. 09 A.M.

Friday, February 25, 2011

तुम-हम हम-तुम

tum ho to hum hain
hum hain to tum ho
tum nahin to hum nahin
hum nahin to tum kahan
tum mein hum hai
...aur hum mein tum
issi liye to hain hum-tum aur tum-hum.
तुम हो तो हम हैं
हम हैं तो तुम हो
तुम नहीं तो हम नहीं
हम नहीं तो तुम कहाँ
तुम में हम हैं
और हम में तुम
इसी लिए तो हैं हम-तुम और तुम-हम!!!!
February 25, 2011 at 10.02 P.M.

Saturday, February 19, 2011

बंद दरवाज़ा

बंद दरवाज़ा
शायद पीछे तुम हो
नहीं जानती
खुल जाए ग़र ये
शायद तुम्हें देख
समझ पाऊं
उलझा हुआ है जो इस दरवाज़े के पीछे
शायद सुलझ जाए
आहट तो है तुम्हारी उस ओर
पदचापें भी हैं कुछ अधीर सी
घबराहट है कहीं जान न लूं मैं तुम्हारा अंतर्मन
शायद इसी लिए किया है तुमने दरवाज़ा बंद
कब तक रखोगे मुझे बाहर
मैं-जो एक एहसास हूँ,
मैं-जो तुम्हारे साथ हूँ सदा
नकार न पाओगे मेरे वजूद को
क्योंकि तुम हो
इस लिए मैं हूँ!!!!!
February 19, 2011 at 12.20 A.M.

Friday, February 18, 2011

Bhula baithe hain humein wo apni masrufiyat mein
Aise ki maano hum se waakif hi nahin!!!!!
भुला बैठे हैं हमें वो अपनी मसरुफ़ियत में
ऐसे कि मानो हम से वाकिफ़ ही नहीं!!!!!
February 18, 2011 at 2.17 P.M.

Tuesday, February 8, 2011

ਜੋ ਏਹਸਾਸ ਦੀ ਤਰਹ ਸਦਾ ਨਾਲ ਹੋਵੇ
ਜਿਸ ਦੇ ਨਾਲ ਦਿਨ-ਰਾਤ ਬਸਰ ਹੋਵੇ
ਉਸ ਤੋਂ ਅਸਮਾਨ ਕੀ ਮੰਗਣਾ
ਓ ਤਾਂ ਸਾਰੇ ਜਹਾਂ ਨੂ ਤੇਰੇ ਤੇ ਵਾਰ ਦੇਵੇ!!!
February, 08, 2011 at 10.54 P.M.

Saturday, February 5, 2011

guzar gaya jo waqt,baar-baar nahin aanda
ik vaar jo chala jaaye,vaar-vaar nahin aanda
dostaan naal jo vi sama mile,guzaar lo
dostaan naal baithan da sama baar-baar nahin aanda..
February 5, 2011 at 12.08 A.M.

Saturday, January 29, 2011

संगिनी

वो अचानक आई ज़िन्दगी में
दिल में हलचल हुयी
साथ रहे, जाना
प्रेमिका फिर प्रेयसी
फिर जीवन का अभिन्न अंग
प्यार था
है
बस प्यार के मायने बदल गए हैं
स्तर ऊँचा हो गया है
अब वो संगिनी, अर्धांगिनी
मेरे साथ चल रही है
मेरे जीवन को और अर्थ-पूर्ण करते huye
मुझे और भाव-विभोर करते हुए
मेरे जीवन का हिस्सा
मेरी संगिनी!!!
January 29, 2010 at 3.00 P.M.

Wednesday, January 26, 2011

तनहा हूँ,
तन्हाई सदा मेरे साथ है!
लफ़्ज़ों की भीड़ में,
मेरी ख़ामोशी चीखती है!
मन के कोने में दबे लफ्ज़,
बाहर आने को तड़पते हैं!
गुथम-गुथा हो रहे हैं अन्दर,
लड़ाई,
खीचा-तानी,
अंतर-द्वंद्व,
कब तक चलेगा?
कब ख़त्म होगी यह तन्हाई?
शायद कभी नहीं!!
अकेले आये हैं,
अकेले जूझेंगे इस तन्हाई से,
लफ्ज़ ढूँढ आवाज़ देंगे इसे
अपने लिए,
खुद से बात करने के लिए!!!
January 26, 2010 at 11.15 P.M.
ram naam simar ae bande
kat jaan ge sab dukh
mil jayyega swarg zameen te
jeen da arth ho jaayega poora!!!!
January 26, 2011 at 10.50 P.M.

Saturday, January 22, 2011

For MY MOTHER

As I look back and ponder
at my nurse, teacher and counselor,
I realize that she was none other
but MY MOTHER.

She was the cook, cleaner, friend,
all rolled into one.
How everything she could understand
I still cannot comprehend.

It was her love for me
that drove her on
to do all those sacrifices for me.
Thank you Ma for bieng there for me.
Thank you Ma for everything.
January 22, 2011 at 8.15 A.M.

Monday, January 10, 2011

Scent......

Partaking my favourite poison;
as I watch it swirl and dance,
memories of years gone by,
flash through my mind.
The scent of a girl
has remained with me
through the years.
Coursing through my veins as blood,
living within me with every breath I take,
she has been my companion for long.
Part of my sub-conscious
she is now with me every waking moment.
I thought I would exorcise the demon
of her scent.
But,each miniscule moment
has made it stronger.
I now tell myself:
que sera sera......
whatever will be will be.....
que sera sera.......
January 10, 2011 at 10.47 P.M.

Sunday, January 9, 2011

Love for a friend

Love for a Friend

Love is not merely unabashed sex.
It is more than that.
It is a warm hug,
a hand held in a warm hand,
fingers laced thru each other's fingers;
holding on to each other physically,
bonding emotionally and mentally.
Looking into each other's eyes,
being honest,being open.
Comforting,being comforted.
Smiling,laughing.
Also certain that the shoulder would be offered
to cry on,if needed.
Loving a friend is not hard
if he has a true heart.
Be my friend forever,
I will not hurt you ever.
A friend's love I have for you,
and the feelings will remain true.
Stay blessed my friend
because you are one of a kind.
January 9, 2011 at 8.57 P.M.

धुँध में छिपे रिश्ते.....

धुँध में छिपे रिश्ते,
आधे-अधूरे से,
टेड़े-मेड़े,
न दिखते हैं, न ही छिपे रहते हैं!
एक परत सी जम जाती है उन पर!
कभी हाथ से,कभी बातों से,
कभी मन से तो कभी कपडे से,
उस धुँध को हटा,
रिश्तों को ढूँढना पड़ता है!
फिर हाथों में ले,
उन्हें आकार दे,
उन में जान डालनी पड़ती है!
और, धुँध से छटे यही रिश्ते,
फिर अहम् हो जाते हैं ज़िन्दगी के लिए!!!
January 9, 2011 at 4.52 A.M.

Tuesday, January 4, 2011

Father

No one can take the place of a loving and affectinate father.
His is the finger which helps to take the first step and move futher.
He is the friend,guide and mentor; all roled into one.
My father was my heart and soul.
He was there to protect me,
And with him all my worries would flee.
His love coursed through my veins like blood.
He was my world: as was I his.
He showered all his love on me with a kiss.
My peace,my comfort,
To whom I could turn in times of hurt.
Worlds, continents, oceans now separate us.
Still I will not make too much fuss.
I know you are one with the Creator,
Who is now my loving Father.
In my heart he will always remain,
My sheet anchor,
who was ready to absorb my every pain.
I just have to look within,
To know the abundance of your love and affection.
To my dying day I will love you,
Because I know that you will see me through.
January 4, 2011 at 8.46 A.M.

Sunday, January 2, 2011

ज़िन्दगी का सफ़र

ज़िन्दगी के सफ़र में
लोग मिलते हैं,
बीछड़ जाते हैं!
कुछ लहरों की तरह आ,
रेत पर अपने निशाँ छोड़ चले जाते हैं!
कुछ अपनी सड़ी-गली बातों से
मूँह में इक कड़वा स्वाद छोड़,
मन को मतली करने पर मजबूर कर देते हैं!
ठंडी हवा के झोंकों से कुछ
तपते मन को सहला जाते हैं!
बारिश की बूंदों से कुछ,
अंतर्मन को पुलकित कर,
चेहरे पर मुस्कान छोड़ जाते हैं!
शराब के घूँट की तरह
कुछ मस्ती में नहला जाते हैं!
जिंदा होने का एहसास दे,
कुछ आत्मा को पवित्र कर,
मन को आज़ादी से आसमाँ में,
विचरने के लिए प्रेरित कर जाते हैं!
ए ख़ुदा, अपनी अमान में रखना मेरे दोस्तों को!
दुःख का हल्का सा झोंका भी छू ना जाए उन्हें,
दोनों हाथ जोड़ यही दुआ माँगती हूँ सबके लिए!!

January 2, 2011 at 10.09 A.M.



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