सबको दिल की बात बताना कहाँ मुमकिन होता है
ये फ़साना सब को बयाँ नहीं किया जाता
अंधे-बहरों के शहर में
सब दिल की बात कहाँ समझते हैं
सुन कतरा निकल जाते हैं
किसको दिल की गहराईयों का इल्म है
परतों में क्या छुपा है
कौन जानता है
क्या बताएँ दिल की बात को
कोई हम-ज़ुबां, हम-नफ्ज़, हम-लफ्ज़ तो मिले!!!!
October 4, 2010 at 8.52 A.M.
CLOSE TO ME
My friends,
It feels good to have my own blog.....there are things which are close to my heart and things which have affected me one way or the other.....my thoughts,my desires,my aspirations,my fears my gods and my demons---you will find all of them here....I invite you to go through them and get a glimpse of my innermost feelings....................
It feels good to have my own blog.....there are things which are close to my heart and things which have affected me one way or the other.....my thoughts,my desires,my aspirations,my fears my gods and my demons---you will find all of them here....I invite you to go through them and get a glimpse of my innermost feelings....................
Monday, October 4, 2010
Sunday, October 3, 2010
यह सुन्दर वाटिका भी आज निशब्द है....
लंबी चिमनी
सियाह कालिख से लथ-पथ
अपनी नाभि में दाँत गढ़ाए
काला धुंआ उगलती
जलती
धरती को जलाती,
नब्ज़ मंद होती,
सांस लेने को तरसती
चाँद भी धुंधला पड़ गया है
सितारे साथ छोड़ गए हैं
हवा का चेहरा मुरझाया सा है
शीशे में अपने अक्स को देखने को कतराता
बादल से खून के आँसूं क्यों बह रहे हैं?
सिक्कों की खनक बारम्बार
कोयल के गीत को दबा रही है
पक्षियों की चहचहाहट मौन है
पोधों के चेहरों पर हँसी नहीं है
यह सुन्दर वाटिका भी आज निशब्द है....
October 3, 2010 at 10.50 P.M.
translated an English poem into Hindi
सियाह कालिख से लथ-पथ
अपनी नाभि में दाँत गढ़ाए
काला धुंआ उगलती
जलती
धरती को जलाती,
नब्ज़ मंद होती,
सांस लेने को तरसती
चाँद भी धुंधला पड़ गया है
सितारे साथ छोड़ गए हैं
हवा का चेहरा मुरझाया सा है
शीशे में अपने अक्स को देखने को कतराता
बादल से खून के आँसूं क्यों बह रहे हैं?
सिक्कों की खनक बारम्बार
कोयल के गीत को दबा रही है
पक्षियों की चहचहाहट मौन है
पोधों के चेहरों पर हँसी नहीं है
यह सुन्दर वाटिका भी आज निशब्द है....
October 3, 2010 at 10.50 P.M.
translated an English poem into Hindi
बे-रंग है जुबां .........
मन में छिपा डर है
कहीं कोई रुसवा न हो जाए
नाप-टोल कर हर बात कहता हूँ
कहीं किसी का दिल न टूट जाए
मंदिर, मस्जिद, गुरूद्वारे के फेर में
ऐसा फसा हूँ
कि अपनी स्वाभाविकता
ही भूल चूका हूँ
रंग तो जैसे सब फीके पड़ चुके हैं
बे-रंग है जीवन
और उस से बे-रंग है जुबां
शायरी किसी कोने में पड़ी
सिसकियाँ ले रही है
अब तो बस जुबां हिला
बात करता हूँ
वरना शब्द तो जाने कहाँ खो गए हैं!!!!!
October3, 2010 at 9.41 A.M.
कहीं कोई रुसवा न हो जाए
नाप-टोल कर हर बात कहता हूँ
कहीं किसी का दिल न टूट जाए
मंदिर, मस्जिद, गुरूद्वारे के फेर में
ऐसा फसा हूँ
कि अपनी स्वाभाविकता
ही भूल चूका हूँ
रंग तो जैसे सब फीके पड़ चुके हैं
बे-रंग है जीवन
और उस से बे-रंग है जुबां
शायरी किसी कोने में पड़ी
सिसकियाँ ले रही है
अब तो बस जुबां हिला
बात करता हूँ
वरना शब्द तो जाने कहाँ खो गए हैं!!!!!
October3, 2010 at 9.41 A.M.
Saturday, October 2, 2010
लाल ग़र होता.......
'लाल' ग़र आज होता
हमारे देश में
राजनीतज्ञों का यूँ अकाल न होता
हम भी सर उठा कह पाते
'हमने चुना है इस नेता को
बागडोर दी है देश की इसके हाथ में
यकीं है हमें इसकी इमानदारी पर
इसी लिए है ये सबसे बड़ी पदवी पर
इस जैसा और नहीं
यही है सब से सही
तभी है ये देश का नेता
हमारे भारत का बेटा
ये देश को आगे ले जाएगा
चाहे इसका सब लुट जाएगा'!
है 'लाल' तो देश है
'लाल' नहीं तो बिक रहा है देश
अरे जाओ कोई तो 'लाल' लाओ
और देश को इन हरामखोरों से बचाओ!!!!
October 2, 2010 at 10.52 P.M.
हमारे देश में
राजनीतज्ञों का यूँ अकाल न होता
हम भी सर उठा कह पाते
'हमने चुना है इस नेता को
बागडोर दी है देश की इसके हाथ में
यकीं है हमें इसकी इमानदारी पर
इसी लिए है ये सबसे बड़ी पदवी पर
इस जैसा और नहीं
यही है सब से सही
तभी है ये देश का नेता
हमारे भारत का बेटा
ये देश को आगे ले जाएगा
चाहे इसका सब लुट जाएगा'!
है 'लाल' तो देश है
'लाल' नहीं तो बिक रहा है देश
अरे जाओ कोई तो 'लाल' लाओ
और देश को इन हरामखोरों से बचाओ!!!!
October 2, 2010 at 10.52 P.M.
Friday, October 1, 2010
जर्जर हो चुकी धरती......
चारों और धुआं ही धुआं है
कुछ सुझाई नहीं देता
हाथ को नहीं पहचानता
एक काट रहा है
एक चीर कर साफ़ निकाल जाता है
काला गहरा धुंआ
परिंदों की चीत्कार
नदियों की पुकार
कोई सुन रहा है क्या?
अरे, देखो
वो एक पेड़
पड़ा है धरती पर
अब तो केवल ठूंठ ही बचा है
जड़ें तो कब की सूख चुकीं
धरती जर्जर हो चुकी
आसमान सफ़ेद हो चला
इंसान अभी भी सोया है
कुभ्करण की नींद
उठेगा तो कुछ नहीं बचेगा
शायद अभी जाग जाए
शायद धुंआ छट जाए!!!!
October 1, 2010 at 4.04 P.M.
कुछ सुझाई नहीं देता
हाथ को नहीं पहचानता
एक काट रहा है
एक चीर कर साफ़ निकाल जाता है
काला गहरा धुंआ
परिंदों की चीत्कार
नदियों की पुकार
कोई सुन रहा है क्या?
अरे, देखो
वो एक पेड़
पड़ा है धरती पर
अब तो केवल ठूंठ ही बचा है
जड़ें तो कब की सूख चुकीं
धरती जर्जर हो चुकी
आसमान सफ़ेद हो चला
इंसान अभी भी सोया है
कुभ्करण की नींद
उठेगा तो कुछ नहीं बचेगा
शायद अभी जाग जाए
शायद धुंआ छट जाए!!!!
October 1, 2010 at 4.04 P.M.
Thursday, September 30, 2010
bourgeois हो या proletariat
rahoge to insaan hi
proletariat ko to insaan nahin samjhta bourgeois
sochta hai gulaam hai uska wo
apne joote ki nok par rakhta hai proletariat ko
...par proletariat ke bina to sansar nahin chal sakta
aap bourgeois ho ke bhi nahin ho
apni 60 ki raftaar mein bhi
aadmi-aadmi ka fark nahin bhule
aapse bourgeois ki kya fajihat
jisne pyar kiya insaan ko insaan ki tarah....
September 30, 2010 at 10.43 P.M.
rahoge to insaan hi
proletariat ko to insaan nahin samjhta bourgeois
sochta hai gulaam hai uska wo
apne joote ki nok par rakhta hai proletariat ko
...par proletariat ke bina to sansar nahin chal sakta
aap bourgeois ho ke bhi nahin ho
apni 60 ki raftaar mein bhi
aadmi-aadmi ka fark nahin bhule
aapse bourgeois ki kya fajihat
jisne pyar kiya insaan ko insaan ki tarah....
September 30, 2010 at 10.43 P.M.
Monday, September 27, 2010
इर्ष्या है मगर मुझको बहुत उससे.........
मेरे अलावा भी बहुत सारे हैं दोस्त उसके
बहुत हैं जिनसे रिश्ता है जैसा मुझसे नहीं
खुश हूँ इर्ष्या है मगर मुझको बहुत उससे
मुझे मिला एक दोस्त वो जिसके है बहुत दोस्त
सब के लिए है समय उसके पास
बस मेरे लिए ही नहीं
गर ऐसा ही रिश्ता था निभाना उसको
क्यों कर आया वो मेरी ज़िन्दगी में
दूर रहता,नज़दीक नहीं आता
मन को बहला लेता यह कह
कि वो जहाँ है खुश रहे
नहीं है मेरी दुनिया में तो क्या हुआ
आबाद रहे उनकी दुनिया जिनके संग वो मुस्कुराता है!!!!
September 27,2010 at 8.35 A.M.
बहुत हैं जिनसे रिश्ता है जैसा मुझसे नहीं
खुश हूँ इर्ष्या है मगर मुझको बहुत उससे
मुझे मिला एक दोस्त वो जिसके है बहुत दोस्त
सब के लिए है समय उसके पास
बस मेरे लिए ही नहीं
गर ऐसा ही रिश्ता था निभाना उसको
क्यों कर आया वो मेरी ज़िन्दगी में
दूर रहता,नज़दीक नहीं आता
मन को बहला लेता यह कह
कि वो जहाँ है खुश रहे
नहीं है मेरी दुनिया में तो क्या हुआ
आबाद रहे उनकी दुनिया जिनके संग वो मुस्कुराता है!!!!
September 27,2010 at 8.35 A.M.
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